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योगी सरकार ने शिकायत के लिए Whatsapp नंबर किया जारी, 3 घंटे के अंदर होगा ऐक्शन


लखनऊ: बोर्ड परीक्षाओं में नकल रोकने के लिए जारी किए वॉट्सऐप नंबर के बाद अब योगी सरकार ने शिकायतों के लिए एक वॉट्सऐप नंबर जारी किया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शिकायतों के लिए एक वॉट्सऐप नंबर जारी किया है। कहा गया है कि इस नंबर पर की गई शिकायत पर 3 घंटे के भीतर ऐक्शन लिया जाएगा।



मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरफ से मोबाइल नंबर 09454404444 नंबर जारी किया गया। सरकार की ओर से कहा गया है कि जनता अपनी शिकायत इस नंबर पर वॉट्सऐप मैसेज भेजकर कर सकती है। अधिकारी तुरंत इस पर ऐक्शन लेंगे।

इससे पहले सोमवार को ही यूपी सरकार ने नकल रोकने के लिए भी हेल्पलाइन( 0522-2236760, 9454457241) हेल्पलाइन नंबर जारी किया। लोगों से नकल रोकने के लिए सहयोग की अपील की गई है। शिकायतों के लिए लखनऊ में एक कंट्रोल रूम बनाया गया है, जहां सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक फोन के माध्यम से शिकायतें नोट कराई जा सकती हैं।

यूपी में 100 रुपये के भुगतान पर भी मिलेगा बिजली कनेक्शन




लखनऊ । योगी सरकार राज्य के गरीब परिवारों को मुफ्त में बिजली कनेक्शन देने के साथ ही उन्हें रियायती दर पर बिजली मुहैया कराएगी। निम्न मध्यम वर्गीय परिवार किस्तों पर भुगतान कर बिजली का कनेक्शन हासिल कर सकेंगे। भाजपा के चुनावी वादे (संकल्प पत्र) को अमली जामा पहनाने के लिए ऊर्जा मंत्री के निर्देश पर पावर कारपोरेशन प्रबंधन ने कवायद शुरू कर दी है।
पावर कारपोरेशन के प्रबंध निदेशक विशाल चौहान ने सभी डिस्कॉम के प्रबंध निदेशकों को निर्देश दिया है कि सभी गरीब परिवारों को मुफ्त में बिजली का कनेक्शन सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों को एक से दो किलोवाट विद्युत भार के कनेक्शन को भी किस्तों में भुगतान पर देने के निर्देश दिए हैं। ऐसे में प्रतिमाह 100 रुपये के भुगतान पर बिजली का कनेक्शन लिया जा सकेगा।

बूचड़खाना बंद होते ही मासांहारी होटलों में बिकने लगे दाल-सब्जी




योगी सरकार के आते ही सबसे पहले अवैध बूचड़खानों की शामत आई,और अब इस शामत की आंधी में बरेली का एक बूचड़खाना ढह गया।बरेली नगर निगम ने कार्रवाई करते हुए एक अवैध स्लॉटर हाउस को बंद करा दिया जिसके बाद से मीट के व्यापारियों में हड़कंप मचा हुआ है।

कर्जदार किसानों को ‘योगी’ से राहत का इंतजार



चुनाव के दौरान भाजपा ने किया था वायदा, अब भाजपा की सरकार बनने के बाद हर किसी की नजर मुख्यमंत्री पर
चुनाव प्रचार के दौरान कर्जमाफी का वायदा जमकर गूंजा। किसानों ने भाजपा के पक्ष में जमकर वोटिंग की, जिसका नतीजा उसकी प्रचंड जीत के रूप में सामने आया। अब बारी है प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में सरकार गठित होने के बाद किसानों से किए गए वायदे को निभाने की। कर्जदार किसान योगी सरकार से राहत को उम्मीद को प्रतीक्षारत हैं।
काश्तकारों ने कर्ज अपनी निजी जरूरतों को पूरा करने के लिए नहीं बल्कि खेती के संसाधनों की पूर्ति के लिए लिया था। ऐसा भी नहीं कि लागत के अनुरूप पैदावार कम हुई लेकिन उत्पादित आलू, उड़द, मूंग और बाजरा का जो रेट मिला, वह लागत के लिहाज से काफी कम रहा। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के नेताओं ने सभाओं में खुलकर कहा था कि सत्ता संभालते ही छोटे किसानों के कृषि कार्य से जुड़े कर्ज माफ कर दिए जाएंगे। इसी के चलते कर्जदार किसानों में ज्यादातर ऐसे भी हैं जिन्होंने कर्ज माफ होने की स्थिति में बच्चों की पढ़ाई से लेकर घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए खाका तैयार कर लिया है।

किसानों का नजरिया
प्रदेश सरकार से पूरी उम्मीद
ब्लॉक क्षेत्र के गांव पथरघटा निवासी सोरन सिंह के पास छह बीघा जमीन है। उसने किसान क्रेडिट कार्ड के जरिए बैंक से लोन लिया था लेकिन वह जमा नहीं कर पाया। सोरन ने बताया कि खेती की जरूरतों को पूरा करने के लिए तांगा भी चलाता है। उसे पूरी उम्मीद है कि योगी सरकार कर्ज माफ कर देगी।

वायदा किया तो निभाना पड़ेगा
गांव खिरिया वाकरपुर निवासी गोवर्धन लाल मौर्य को कर्ज माफी के मुद्दे पर स्पष्ट कहना है कि भाजपा को प्रदेश की सत्ता में प्रचंड बहुमत के साथ पहुंचाने में किसानों का योगदान भी कम नहीं है। गोवर्धन बोले- कर्ज माफी का वायदा कोई जुमला नहीं था जो लोग भूल जाएं। वायदा तो निभाना पड़ेगा।

किसानों के हित में काम करे सरकार
टिमरुआ गांव के कल्लू के नाम किसी भी बैंक में कृषि ऋण नहीं है लेकिन कर्ज माफी को लेकर इलाके के किसानों की आवाज पर सहमत कल्लू का कहना है कि प्रदेश सरकार किसानों का कर्ज माफ करती है तो पूरे काश्तकार समुदाय को लाभ मिलेगा।

निर्णय लेने में देर न करे योगी सरकार
कादरचौक क्षेत्र के गांव लखूपुरा गांव के मनीराम कहते हैं कि चुनाव में वादा तो सपा, बसपा और कांग्रेस ने भी किया लेकिन किसानों ने भरोसा नरेंद्र मोदी पर जताया। उसे उम्मीद है कि कर्ज माफ होगा लेकिन प्रदेश सरकार को निर्णय लेने में देर नहीं करनी चाहिए।

जय श्री राम के नारों के साथ निकला संघ का पथ संचलन.बदायूं



नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा और संघ संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार के जन्म दिन की पूर्व संध्या पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से पूरे उत्साह के साथ पथ संचलन निकाला गया। संचलन के स्वागत के लिए शहर में जगह-जगह केसरिया ध्वज लगाए गए थे। बड़े-बड़े द्वार बनाकर पथ संचलन का स्वागत किया गया। इस दौरान मुख्य स्थानों पर बनाए गए द्वारों पर लाउड स्पीकर के जरिये एक ही नारा, एक ही नाम, जय श्री राम-जय  श्री राम... जैसे नारे गूंजते रहे। पथ संचालन की शुरुआत भोलानाथ धाम से हुई। पथिक चौक, मढ़ई चौक, शास्त्री चौक, नेहरू चौक, लावेला चौक, रजी चौक, सुभाष चौक, टिकटगंज सर्राफा बाजार होते हुए पथ संचलन भोलाधाम लौटकर समाप्त हुआ। दो हजार से ज्यादा गणवेशधारी स्वयंसेवक पथ संचलन में शामिल हुए। सभी हाथ में लाठी लिए ढोल नगाड़ों संग कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़े। सबसे आगे सुरक्षा वाहिनी, घोषवाहिनी भगवा ध्वज के साथ थी। संचलन प्रारंभ होने से पहले विरुआबाड़ी मंदिर में आयोजित बौद्धिक वर्ग में भगवा ध्वजारोहण किया गया। संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार के चित्र पर मुख्य वक्ता सह प्रांत प्रचारक मुनीष कुमार और जिला संघ संचालक सर्वेश पाठक ने माल्यार्पण किया। मुख्य वक्ता मुनीश ने कहा कि संघ की शाखा पावर हाउस के समान है। शहर के सभी चौराहों पर भाजपा महिला मोर्चा समिति, गायत्री परिवार, पतंजलि सेवा केंद्र, बजरंग दल, व्यापार संघ, पंजाबी सेवा समिति, सेवा भारती आदि सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं ने पथ संचलन का पुष्पवर्षा कर स्वागत किया। पथ संचलन में संघ के विभाग प्रचारक उमाकांत, सह विभाग कार्यवाह सत्यप्रकाश, माखनलाल, जगजीवनराम,अंकुर पाराशरी, जोगपाल सिंह, राजेंद्र गुप्ता, रामप्रकाश, सुनील गुप्ता, उज्ज्वल गुप्ता, लालमन, चंदन, गिरीश बाबू, डॉ. सुवेंद्र माहेश्वरी, सतीश माहेश्वरी, राजकुमार आदि प्रमुख रूप से शामिल हुए। सदर विधायक महेश गुप्ता भी गणवेश में पथ संचलन के साथ रहे।

एसओ उसहैत लाइन हाजिर, दातागंज और बिल्सी इंस्पेक्टर हटाए




सूबे में नई सरकार बनने के बाद थाना स्तर पर तबादलों का चाबुक चलने लगा है। एसएसपी महेंद्र यादव ने सोमवार को जिले के तीन थानेदार बदल दिए। एसओ उसहैत मनीष यादव को लाइन जाहिर कर दिया गया है। इंस्पेक्टर बिल्सी और इंस्पेक्टर दातागंज भी हटा दिए हैं। सरकार बनने के बाद सबसे पहले एसओ कादरचौक रुकुमपाल यादव को हटाकर यहां एसएसआई सदर कोतवाली राजेश यादव को एसओ बनाया गया। उघैती में नरेश कश्यप को चार्ज दिया गया और बिनावर में केके यादव को हटाकर सीपी सिंह को थानेदारी दे दी गई थी। सोमवार को एसएसपी महेंद्र यादव ने एसओ उसहैत मनीष यादव को लाइन हाजिर कर दिया। इनकी जगह पर मूसाझाग थाने के एसआई विजयपाल सिंह को एसओ बनाया गया है। इंस्पेक्टर बिल्सी संजय कुमार गोयल को हटाकर क्राइम ब्रांच में भेज दिया गया है। उनकी जगह पर चुनाव सेल में तैनात राजीव शर्मा को भेजा गया है। इंस्पेक्टर दातागंज अमित कुमार को हटाकर दातागंज थाने का चार्ज प्रमोद कुमार को दिया गया है। अमित कुमार को डीसीआरबी में भेजा गया है। अब माना जा रहा है कि जरीफनगर, फैजगंज बेहटा, हजरतपुर, उझानी थानों पर भी तबादलों का चाबुक जल्द चल सकता है।

क्या है 'गणराज्य' या गणतंत्र?


संविधान के अधीन सभी प्राधिकारों का स्त्रोत भारत के लोग हैं। भारत एक स्वाधीन राज्य है और अब वह किसी बाहरी प्राधिकारी के प्रति निष्ठावान नहीं है। हमारे देश का राष्ट्रपति अप्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा निर्वाचित राष्ट्रपति है। अब इस पद सहित किसी भी पद पर भारत के नागरिक की नियुक्ति होना संभव है। इसकी व्याख्या को थोड़ा विस्तार दिया जाना चाहिए था। राष्ट्रपति को राजा के स्थान पर निर्वाचित प्राधिकारी माना जाता। जिसका मुख्य कार्य ऋग्वेद (2/51/5) के अनुसार कुछ-कुछ ऐसा होता-'हे राजन आप प्रकृष्ट बुद्घिवाले, छल-कपटयुक्त अयज्वा और अक्रती लोगों को (दस्युओं को) कम्पायमान कीजिए और जो यज्ञ न करके अपने पेट भरते हैं उन दुष्टों को दूर कीजिए, और इन उपद्रव, अशांति, अज्ञानता और नास्तिकता फैलाने वाले जनों के नगरों को भग्न कर दीजिए।'
पूरे संविधान को आप पलट लें। इस देश के मुखिया को आपातकालीन परिस्थितियों में भी दस्यु-दलन का अधिकार नहीं दिया गया है। जबकि गणराज्य में जनहित सर्वोपरि होता है। इसलिए जनहित में दस्यु-दलन का विशेषाधिकार राष्ट्रपति के लिए रखना अपेक्षित था। इसके लिए भारत के प्राचीन साहित्य और धर्मग्रंथों का अनुशीलन करके निष्कर्ष स्थापित किये जाने चाहिए थे। दस्यु से हमारा अभिप्राय समाज के प्रत्येक ऐसे व्यक्ति से है जो राष्ट्र की एकता और अखण्डता को तथा सामाजिक व्यवस्था को क्षत-विक्षत करने की गतिविधियों में संलिप्त है अथवा संलिप्त पाया जाता है।


दस्यु किसी वर्ग का नाम नहीं है। दस्यु एक व्यक्ति है, एक विचार है, जो मानव समाज के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है। उसे समाज के लिए उपयोगी बनाने के लिए विशेष उपायों की आवश्यकता होती है। इन उपायों में दस्यु दलन अथवा दस्यु वर्ग की पूर्ण समाप्ति भी एक उपाय है। संविधान ने इन दस्युओं को चिन्हित नहीं किया कि कौन-कौन से लोग 'दस्यु' कहे जायेंगे? और उनके साथ किस प्रकार निपटा जायेगा।
ऐसी व्यवस्था के अभाव में 'दस्यु' सांसद बन रहे हैें, विधायक बन रहे हैं और अपने अधीनस्थ और कनिष्ठ दस्युओं का हित संरक्षण कर रहे हैं। गणराज्य का चेहरा विद्रूपित हो चुका है। संविधान मौन है।

'आरक्षण और गणराज्य'
गणराज्य में लोकतन्त्र की प्रथम सीढ़ी ग्राम को माना जाता है भारत में ऐसा ही किया गया है। किन्तु आप देखेंगे कि भारत का राष्ट्रपति तो अप्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा निर्वाचित है जबकि ग्राम का प्रधान (गणपति) सीधे जनता द्वारा चुना जाता है। यह एक भयंकर विरोधाभास हमारे संविधान में है। हमें अपने देश का प्रधनमंत्री भी ग्राम प्रधान की तरह ही चुनना चाहिए। प्रधनमंत्री के लिए सारा देश 'वोट' डाले। या फि र यह होना चाहिए कि ग्राम का गणपति (प्रधान) भी जनता के वोट द्वारा निर्वाचित ग्राम पंचायत सदस्यों में से ही चुना जाए। यह बिल्कुल वैसे ही चुना जाये जैसे प्रधनमंत्री को हमारे सांसद चुनते हैं, अथवा मुख्यमंत्री को हमारे विधायक चुनते है।

ये ग्राम पंचायत सदस्य अपने द्वारा मतदान करके क्षेत्र पंचायत का सदस्य भेज सकते हैं। यह क्षेत्र पंचायत सदस्य गणपति कहा जा सकता है। फि र ये गणपति मिलकर जिला पंचायत सदस्य का निर्वाचन करें जिसे क्षेत्रपति कहा जाये, और अंत में क्षेत्रपति अपने मध्य से एक जिला पंचायत के सभापति का निर्वाचन करें। जिला पंचायतों के इन सभापतियों को भी राष्ट्रपति के निर्वाचक मण्डल में सम्मिलित किया जाये। जिससे कि गणतन्त्र का सही स्वरूप मुखरित हो सके। यह होगा-गणराज्य का सही स्वरूप। साथ ही आज की खर्चीली चुनाव प्रणाली पर होने वाले धन के अपव्यय और राजकोष पर पडऩे वाले अनावश्यक बोझ से भी बचा जा सकेगा।

'भारत का समाजवादी स्वरूप'
भारत के संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवादी' शब्द भी विशेष महत्व रखता है। समाजवाद की सीधी-सादी व्याख्या समाज के प्रत्येक वर्ग और व्यक्ति तक शासन की नीतियों का सही लाभ पहँुचाने से है। महल और झोंपड़ी के अन्तर को समाप्त करते-करते धीरे-धीरे पूर्णत: समाप्त करना इस व्यवस्था का उद्देश्य है। इस 'समाजवाद' शब्द की लोगों ने मनमानी व्याख्याएं की हैं। ये लोग समाजवाद की अपनी-अपनी व्याख्याओं के  जंजाल में इस प्रकार उलझे कि समाजवाद की चादर को ही फ ाड़ बैठे। फ लस्वरूप आज समाजवाद के चीथड़े उड़ गये हैं। जो समाजवाद हमें दीख रहा है वह समाजवाद नहीं है, अपितु समाजवाद की विकृतावस्था है। उसके चीथड़े हैं, टुकड़े हैं।
दुर्भाग्य से भारत ने समाजवाद की जिस व्यवस्था को अंगीकृत किया वह कोई सुन्दर परिणाम नहीं दे पायी।
भारत को समाजवाद को अपने 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' से जोडक़र देखना चाहिए था। उसे संसार में जनोपयोगी बनाने के लिए भारत को समाजवाद की सही व्याख्या और परिभाषा प्रस्तुत करनी चाहिए थी। किन्तु हमने अपने स्वभाव के अनुसार पुरुषार्थहीनता का परिचय देकर पश्चिमी जगत के कुछ विद्वानों के उच्छिष्ट भोजन को ग्रहण करने में ही कत्र्तव्य की इतिश्री मान ली। इसलिए समाजवाद की प्रचलित व्याख्या, व्यवस्था ओर परिभाषा को गले लगाये चले जा रहे हैं। परिणामस्वरूप भारतीय समाज का अधिकांश भाग आज भी ऐसा है जो झोंपड़ी से भी वंचित है। फु टपाथ पर खुले आकाश के नीचे सोते लोग महानगरों की निर्मम जनता और निर्दयी शासन का ध्यान भंग नहीं करा पाये। मनुष्य, मनुष्य के प्रति कठोर हो गया।

हमें ऐसे प्रयास करने चाहिए थे कि मनुष्य की मनुष्य के प्रति कठोरता पिघलती। यह ऐसा प्रयास हमें सुसंस्कृत करता, संस्कारित और परिमार्जित करता।
'संस्कारोतीति य: संस्कृति।' अर्थात संस्कृति वही है जो हमारा संस्करण करे, परिमार्जन करे। हमें मांजे, भीतर से स्वच्छ कर दे। व्यक्ति का परिमार्जन कर उसे मानव बनाना संस्कृति का परम उद्देश्य है। यह परिमार्जन ही भारत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। यदि हम भारतीय लोग इस 'परिमार्जनवादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' को अपनाते तो समाजवाद का सही स्वरूप संसार को मिल सकता था। हमारा समाज सीख जाता- खुले आकाश वालों को और झोंपड़ी वालों को भवन उपलब्ध् कराना।

दुर्भाग्य से हमारी उधरी मनीषा जनित भिक्षावृत्ति ने हमें अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जुडऩे नहीं दिया। उल्टे जिन लोगों ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात देश में की उन्हें साम्प्रदायिक कहकर चिढ़ाने का प्रयास और किया गया। परिणामस्वरूप देश में एक ऐसा माहौल बना कि यहाँ रहकर अपने देश की बात नहीं करनी है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के समाजवाद को कुछ लोगो ने मुस्लिमों के प्रति एक सुनियोजित षड्यंत्र सिद्घ करने का अनुचित प्रयास किया। फ लस्वरूप यह पावन शब्द हमारे समाज में भी गले की हड़्डी बनकर रह गया है। हमें समझ नहीं आता कि इसे किन अर्थों व सन्दर्भो में अपनायें? कितना अच्छा होता कि समाजवाद के शब्द के साथ हमारी संविधान सभा या संसद, 'सांस्कृतिक राष्ट्रवादी समाजवाद' का प्रयोग करते। यदि ऐसा हो जाता तो आगे तक की समस्याऐं समाप्त हो जातीं। तब हमें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर आज मिलने वाले अपशब्द नहीं सुनने पड़ते। इस शब्द के जुडऩे से ही देश में ऐसा माहौल बनता कि सभी लोग अपनी मानवीय गुणों से आपूरित वैदिक संस्कृति की ओर स्वयं ही झुक जाते। हिंदू-मुस्लिम की समस्या राष्ट्र में ना होती। तुष्टिकरण ना होता। बस होता तो हिंदू-मुस्लिम के स्थान पर नागरिक और तुष्टिकरण के स्थान पर 'पुष्टिकरण' (धर्मसम्मत और लोकसम्मत सिद्घांतों और व्यवस्थाओं की पुष्टि) होता।

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