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October 31, 2016

बदायूँ एक्सप्रेस | तेज रफ़्तार | क्रिकेट हो या हॉकी एशिया का BIG BOSS तो भारत ही है





क्रिकेट | आज से करीब 11-12 साल पहले मैं सौरव गांगुली का एक इंटरव्यू कर रहा था. सौरव तब भारतीय टीम के कप्तान हुआ करते थे. मैंने उनसे पाकिस्तान के खिलाफ खेले जाने वाले मैचों के मानसिक दबाव को लेकर सवाल किया था. सौरव का जवाब था कि अब भारतीय टीम पाकिस्तान के खिलाफ मैच में मानसिक दबाव वाली स्थिति से बाहर आ चुकी है. उनका कहना था कि पाकिस्तान के खिलाफ मैदान में उतरने से पहले ही हमें इस बात का अहसास रहता है कि हमारी टीम उनसे बेहतर है. हां, अगर मजेदार मुकाबला देखना है तो भारत बनाम ऑस्ट्रेलिया या भारत बनाम दक्षिण अफ्रीका का मैच देखिए. पिछले एक दशक में उनकी ये बात बिल्कुल सही साबित हुई है. विश्व क्रिकेट में भारत की बादशाहत के रास्ते में पाकिस्तान की टीम कभी अड़चन नहीं बनी. ज्यादातर बड़े मैचों में पाकिस्तान को भारत ने आसानी से हराया. भारतीय टीम के लिए अगर मुश्किल पैदा की तो ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका जैसी टीमों ने. सौरव गांगुली का वो इंटरव्यू आज इसलिए याद आ रहा है क्योंकि क्रिकेट की कहानी आज हॉकी पर भी लागू हो रही है.

भारत ने पाकिस्तान को हराकर जीती एशियन चैंपियंस ट्रॉफी

भारतीय हॉकी टीम ने दीपावली के दिन पाकिस्तान को 3-2 से हराकर एशियन चैंपियंस ट्रॉफी जीत ली. वो भी तब जबकि भारतीय टीम अपनी पूरी ताकत के साथ मैदान में नहीं उतरी थी. भारतीय टीम के दिग्गज खिलाड़ी वीआर रघुनाथ, सुनील और मनप्रीत सिंह इस मैच में नहीं खेल रहे थे. भारतीय कप्तान पीआर श्रीजेश भी चोट की वजह से फाइनल नहीं खेल पाए. यानि सही मायनों में देखा जाए तो भारतीय टीम के सेकेंड लाइन अप ने भारत को ये जीत दिलाई. स्कोरलाइन में जीत का फर्क भले ही सिर्फ एक गोल का दिख रहा हो लेकिन अगर भारतीय टीम पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरी होती तो क्या पता ये अंतर और बड़ा भी होता. खैर, फिलहाल बात इस मुद्दे पर कि पिछले कुछ सालों में ऐसा क्या हुआ कि भारतीय टीम पाकिस्तान के खिलाफ ज्यादा आसानी से जीत हासिल करने लगी. कुछ इक्का दुक्का मौकों को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर बाजियां भारतीय टीम के हक़ में आईं.

बड़े कोच की बड़ी सोच
पिछले कुछ सालों में भारतीय टीम की कोचिंग की कमान विदेशी दिग्गजों ने संभाली है. उनमें से कई बड़े नामों को हटना भी पड़ा. लेकिन रॉलैंट ऑल्टमैंस के आने के बाद भारतीय हॉकी का एक नया चेहरा सामने आता दिख रहा है. पिछले करीब दो साल में भारतीय टीम का प्रदर्शन लगातार बेहतर हुआ है. इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह है रॉलैंट ऑल्टमैंस की बड़ी सोच. उन्हें पता है कि अब भारतीय टीम के खेल का स्तर बाकी की एशियाई टीमों के मुकाबले बेहतर है इसीलिए वो लगातार भारतीय टीम के ऑस्ट्रेलिया, हॉलैंड और जर्मनी जैसी टीमों के खिलाफ खेलने पर जोर देते हैं. एक दौर था जब ये दलील लगातार दी जाती थी कि अगर भारत और पाकिस्तान की टीमों को अपनी हॉकी सुधारनी है तो एक दूसरे के खिलाफ ज्यादा से ज्यादा खेलना चाहिए. ऑल्टमैंस ने इसी सोच को तोड़ा है. उन्होंने खिलाडियों में ये आत्मविश्वास कूट कूट कर भर दिया है कि वो आज की तारीख में पाकिस्तान की टीम से कहीं बेहतर हॉकी खेलते हैं. इससे आगे के स्तर पर जाने के लिए उन्हें यूरोपियन टीमों के खिलाफ पसीना बहाना होगा ना कि एशियाई टीमों के खिलाफ. ये बात गौर करने वाली है कि पिछले कुछ समय में भारतीय टीम एशियाई टीमों के खिलाफ खेले गए कुल मैचों में ना के बराबर हारी है.

रॉलैंट ऑल्टमैंस पाकिस्तान की टीम के भी कोच रहे हैं. उन्हें पाकिस्तान के खिलाड़ियों की सोच, उनकी ताकत और कमजोरियों का पता अच्छी तरह है. उन्हें ये भी पता है कि पिछले करीब ढ़ाई दशक से दोनों ही टीमों ने विश्व स्तर पर कोई बहुत बड़ा खिताब नहीं जीता है, ऐसे में दोनों टीमों के आपस में खेलने का क्या मतलब है? खेलना है तो उस टीम से खेला जाए जो लगातार हमें हरा रही है. भारतीय टीम ने पिछले दो साल में चैंपियंस ट्रॉफी और वर्ल्ड लीग में मेडल जरूर जीता है लेकिन ओलंपिक या वर्ल्ड कप जैसी प्रतियोगिताओं के लिए अभी काफी मेहनत करनी है.

एक नहीं तीन तीन जीत का तोहफा

दीवाली के दिन हॉकी में जीत की हैट्रिक लगी. मलेशिया में भारतीय टीम ने पाकिस्तान को हराकर एशियन चैंपियंस ट्रॉफी जीती. महिलाओं के मुकाबले में भारतीय टीम ने कोरिया को हराया. जूनियर हॉकी टीम ने विश्व कप की तैयारियों के लिए चल रहे 4 नेशन टूर्नामेंट का खिताब जीता. विश्व कप दिसंबर में भारत में ही होना है.

और आखिर में एक दिलचस्प संयोग

1983 के विश्व कप में भारतीय टीम के कप्तान कपिल देव ने जिम्बाव्वे के खिलाफ एतिहासिक 175 रनों की पारी खेली थी लेकिन उस रोज बीबीसी की हड़ताल के चलते वो पारी कोई देख नहीं पाया. ये एक संयोग ही है कि दीवाली की वजह से देश के तमाम अखबारों में कल छुट्टी का दिन था इसलिए आज अखबार नहीं आए. वर

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