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सरकार ने बताया मो. अली हरिज को छोड़कर बिपिन रावत को इसलिए बनाया सेना प्रमुख




 दिल्ली। सीबीआई के कार्यकारी निदेशक के बाद नए सेनाध्यक्ष के रूप में लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत की नियुक्ति को लेकर सियासी बवाल पैदा हो गया है। कुछ स्तरों पर इसे धार्मिक रंग दिए जाने की कोशिशों की आशंका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

कांग्रेस और वामदल ने दो वरिष्ठ अफसरों को नजरअंदाज कर रावत की नियुक्ति पर प्रधानमंत्री से जवाब मांगा है। वहीं, भाजपा ने सेना पर सियासत करने की आलोचना करते हुए कहा कि विपक्षी दल अपनी हताशा का परिचय दे रहे हैं। शनिवार को सरकार ने अगले सेनाध्यक्ष के रूप में ले. जन. रावत की नियुक्ति की जानकारी दी थी।

सूत्र भी मानते हैं कि पूर्वी कमांडर ले.ज. प्रवीण बख्शी और दक्षिणी कमान के प्रमुख ले.ज. पीएम हरिज भी रावत के मुकाबले सीनियर थे। हालांकि उनका कहना है कि नियुक्ति प्रक्रिया के अनुसार हुई है और उसमें भारत के सामने मौजूद चुनौतियों का ख्याल रखा गया है।

वरिष्ठता की कड़ी तोड़ी - कांग्रेस

कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा कि ले.जन. रावत की योग्यता पर शक नहीं है, लेकिन सेना में वरिष्ठता का महत्व होता है। सेना जैसे संवेदनशील अंग में भी मोदी सरकार मनमर्जी से किसी को भी नहीं चुन सकती।

भाकपा के डी. राजा ने कहा कि सीबीआई के कार्यकारी निदेशक, न्यायपालिका, सीवीसी जैसे पदों पर नियुक्ति भी विवादित हो गई है और इसकी जिम्मेदार सरकार है।

कांग्रेस नेता शहजाद पूनावाला ने ट्वीट कर कहा कि मोदी सरकार ने यह फैसला इसलिए किया ताकि हरिज सेनाध्यक्ष न बन सकें, जो कि मुस्लिम हैं। लेकिन पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी ने पूनावाला के बयान पर सख्ती से असहमति जताई।

10 जनपथ से नियुक्ति का दौर खत्म

केंद्रीय राज्यमंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कांग्रेस पर तंज करते हुए कहा कि अब 10 जनपथ से नियुक्तियों का दौर खत्म हो चुका है।

सरकार ने बचाव में बताई वजह

1. लेफ्टिनेंट जनरल प्रवीण बख्शी (सबसे वरिष्ठ पूर्वी कमांडर) इसलिए खारिज

- आर्म्ड कोर अधिकारी बख्शी के कॅरिअर का अधिकांश समय जोधपुर में बीता।

- कश्मीर में सिर्फ दो पोस्टिंग रहीं।

2. लेफ्टिनेंट जनरल पीएम हरिज (पदानुक्रम में दूसरे दक्षिणी कमान के प्रमुख) इसलिए खारिज

- हरिज के पास नियंत्रण रेखा या आतंकवाद के खिलाफ अभियानों का ऑपरेशनल अनुभव नहीं है।

3. लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत (पदानुक्रम में तीसरे उप-सेनाध्यक्ष) इसलिए चुने गए

- रावत को मौजूदा परिदृश्य को देखते हुए सेना प्रमुख बनाया गया है।

- अशांत (लड़ाई वाले) इलाकों में काम करने का जबर्दस्त अनुभव।

- तीन दशकों में कई अहम जिम्मेदारियां संभाल चुके।

- कई बड़े सैन्य अभियानों की कमान संभाली।

- पाक सीमा, चीन से जुड़ी वास्तविक नियंत्रण रेखा और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में ऑपरेशनल जिम्मेदारियां निभाईं।

यह है प्रावधान

- सैद्धांतिक रूप से सरकार किसी को भी सेना प्रमुख नियुक्त करने के लिए स्वतंत्र है।

- सेना अध्यक्ष की नियुक्ति में हमेशा ही वरिष्ठता के सिद्धांत का पालन किया जाता है।

जब हुई अनदेखी

- इससे पहले 1983 में सेना प्रमुख की नियुक्ति में वरिष्ठता क्रम की अनदेखी की गई थी।

- तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लेफ्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा की जगह जनरल एएस वैद्य को सेना प्रमुख बनाया था।

'सेना में वरिष्ठता बहुत अहम होती है। सरकार ने इसे तोड़ा है तो क्या राजनीति नहीं है।' - मनीष तिवारी, कांग्रेस नेता

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