: "width=1100"' name='viewport'/> बदायूँ एक्सप्रेस | तेज रफ़्तार : राजनीतिक दलों को चुनावी चंदा कहां से आता है

राजनीतिक दलों को चुनावी चंदा कहां से आता है



काले धन के खिलाफ नोटबंदी से शुरू की गई मुहिम की सफलता के लिए जरूरी है कि राजनीतिक दल चुनाव आयोग की सलाह का पालन करते हुए सियासी चंदे में पारर्शिता के कानूनी उपाय अमल में लाएं। हालांकि कानपुर में हुई रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आयोग के सुझाव का समर्थन किया, लेकिन उन्होंने चले आ रहे दोष के लिए पूरी तरह उस जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 को दोषी ठहरा दिया जिसके तहत बीस हजार रुपए से कम के चंदे के स्रोत बताने की छूट मिली हुई है। जबकि मोदी सरकार पूर्ण बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में है, ऐसे में उसे चाहिए कि नोटबंदी की तरह दृढ़ता दिखाते हुए वह कानून में संशोधन का प्रस्ताव संसद में लाए।

दरअसल, निर्वाचन आयोग ने नकद चंदे की अधिकतम सीमा बीस हजार से घटा कर दो हजार रुपए करने की सिफारिश की है। आयोग ने इसके लिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन का सुझाव दिया है। फिलहाल दलों को मिलने वाला चंदा आय कर अधिनियम, 1961 की धारा 13 (ए) के अंतर्गत आता है। इसके तहत दलों को बीस हजार रुपए से कम के नकद चंदे का स्रोत बताना जरूरी नहीं है। इसी झोल का लाभ उठा कर पार्टियां बड़ी धनराशि को बीस हजार रुपए से कम की राशियों में सच्चे-झूठे नामों से बही-खातों में दर्ज कर कानून को ठेंगा दिखाती रहती हैं। इसके साथ ही पार्टियों को आवासीय संपत्ति से आय, बैंकों में जमा-पूंजी के ब्याज और स्वैछिक योगदान से आमदनी तथा अन्य कई स्रोतों से होने वाली आय पर भी कर-छूट मिली हुई है।

हाल ही में चुनाव आयोग ने बताया है कि भारत में उन्नीस सौ पंजीकृत राजनीतिक दल हैं। इनमें से चार सौ से भी ज्यादा ऐसे दल हैं, जिन्होंने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा है। ऐसे में आयोग ने आशंका जताई है कि ये दल संभव है काले धन को सफेद में बदलने का माध्यम बनते हों। आयोग ने अब ऐसे दलों की पहचान कर उनको अपनी सूची से हटाने व उनका चुनाव चिह्न जब्त करने की कवायद शुरू कर दी है। आयोग ने आय कर विभाग को भी ऐसे कथित दलों की आय कर छूट समाप्त करने को कहा है।

असल में ये दल और आय कर कानून, 1961 की धारा 13 (ए) भ्रष्टाचार और काली कमाई को छिपाने तथा सफेद करने में बेइंतहा मदद करते हैं। इसीलिए आयोग ने वास्तविक दलों को ही कर-छूट देने का परामर्श दिया है। यदि ऐसा हो जाता है तो इससे भी चुनाव में गुप्त धन की भूमिका कम होगी और पारदार्शिता की दिशा में एक सार्थक पहल होगी। विमुद्रीकरण के बाद से केंद्र सरकार ऑनलाइन भुगतान-व्यवस्था पर जोर दे रही है, वहीं भाजपा समेत देश के सभी राजनीतिक दल ऑनलाइन चंदा लेने से कतरा रहे हैं। साल 2004 से 2015 के बीच हुए विधानसभा चुनावों में विभिन्न राजनीतिक दलों को इक्कीस सौ करोड़ रुपए का चंदा मिला हैं। इसका तिरसठ प्रतिशत नकदी के रूप में लिया गया है। इसके अलावा, पिछले तीन लोकसभा चुनावों में चौवालीस फीसद चंदे की राशि नकदी के रूप में ली गई थी। राजनीतिक दल उस पचहत्तर फीसद चंदे का हिसाब देने को तैयार नहीं हैं, जिसे वे अपने खातों में अज्ञात स्रोतों से आया दर्शा रहे हैं।
लोकतांत्रिक सुधारों के लिए काम करने वाले संगठन एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार, 2014-15 में व्यापारिक घरानों के चुनावी न्यासों से दलों को 177.40 करोड़ रुपए चंदे के रूप में मिले हैं। इनमें सबसे ज्यादा चंदा 111.35 करोड़ भाजपा को, फिर 31.6 करोड़ रु. कांग्रेस को, 5 करोड़ रु. राकांपा को, 6.78 करोड़ रु. बीजू जनता दल को, 3 करोड़ रु. आम आदमी पार्टी को, 5 करोड़ इंडियन नेशनल लोक दल को और अन्य दलों को 14.34 करोड़ रुपए मिले हैं। दरअसल, राजनीतिक दलों और औद्योगिक घरानों के बीच लेन-देन में पारदर्शिता के नजरिए से 2013 में यूपीए सरकार ने कंपनियों को चुनावी ट्रस्ट बनाने की अनुमति दी थी। ये आंकड़े उसी के परिणाम हैं।

क्षेत्रीय दल भी चंदे में पीछे नहीं रहे हैं। 2004 से 2015 के बीच हुए 71 विधानसभा चुनावों के दौरान क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने कुल 3368.06 करोड़ रुपए चंदा लिया है। इसमें तिरसठ फीसद हिस्सा नकदी के रूप में आया। वहीं 2004, 2009 और 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में क्षेत्रीय दलों को तेरह सौ करोड़ रुपए चंदे में मिले। इसमें पचपन प्रतिशत राशि के स्रोत ज्ञात रहे, जबकि पैंतालीस फीसद राशि नकदी में थी, जिसके स्रोत अज्ञात रहे।

2004 और 2015 के विधानसभा चुनावों के दौरान चुनाव आयोग के पास जमा किए गए चुनावी खर्चों के विवरण में बताया गया है कि समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, शिरोमणि अकाली दल, शिवसेना और तृणमूल कांग्रेस को सबसे ज्यादा चंदा मिला है। इन आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि औद्योगिक घराने चंदा देने में चतुराई बरतते हैं। उनका दलीय विचारधारा में भरोसा होने के बजाय, सत्ताधारी दलों की ताकत में भरोसा होता है। लिहाजा, कांगे्रस और भाजपा को लगभग समान रूप से चंदा मिलता है।
जिस राज्य में जिस क्षेत्रीय दल की सत्
राजनीति को पारदर्शी बनाने की दृष्टि से केंद्रीय सूचना आयोग राज्यसभा सचिवालय के माध्यम से सभी सांसदों से आग्रह कर चुका है कि वे अपने निजी व अन्य कारोबारी हितों को सार्वजनिक करें और अपनी चल-अचल संपति का खुलासा करें। लेकिन आयोग का आग्रह नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित हुआ। ज्यादातर सांसदों ने पारदर्शिता के आग्रह को ठुकरा दिया। जिस ब्रिटेन से हमने संसदीय संरचना उधार ली है, उस ब्रिटेन में परिपाटी है कि संसद का नया कार्यकाल शुरू होने पर सरकार मंत्रियों और सांसदों की संपत्ति की जानकारी और उनके व्यावसायिक हितों को सार्वजानिक करती है। अमेरिका में तो राजनेता हर तरह के प्रलोभन से दूर रहें, इस दृष्टि से और मजबूत कानून है। वहां सीनेटर बनने के बाद व्यक्ति को अपना व्यावसायिक हित छोडऩा बाध्यकारी होता है। जबकि भारत में यह पारिपाटी उलटबांसी के रूप में देखने में आती है। यहां सांसद और विधायक बनने के बाद राजनीति धंधे में तब्दील होने लगती है। ये धंधे भी प्राकृतिक संपदा के दोहन, भवन निर्माण, सरकारी ठेके, टोल टैक्स, शराब ठेके और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के राशन का गोलमाल कर देने जैसे गोरखधंधों से जुड़े होते हैं। अब तो शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी राजनीतिकों का कब्जा बढ़ता जा रहा है। यही कारण है कि अब तक जितने भी बड़े घोटाले सामने आए हैं, वे सब ऐसे ही काले कारोबार से जुड़े पाए गए हैं।

इस लिहाज से यह जरूरी हो जाता है कि देश के अवाम को यह जानने का अधिकार मिले कि जिन पर विकास, लोक कल्याण और प्रजातंत्र का दायित्व है, उन्हें एकाएक मिल जाने वाले धन के स्रोत कहां हैं। यानी राजनीतिक दल पारदर्शिता की खातिर आरटीआई के दायरे में आएं। राजनेता अक्सर जनसाधारण को तो ईमानदारी और पारदार्शिता की नसीहत देते रहते हैं, लेकिन स्वयं उदाहरण कम ही बनते हैं। राजनीति में ऐसे विशेषाधिकार प्राप्त करने की कोशिश चलती रहती है, जिससे काली कमाई के अज्ञात स्रोतों पर पर्दा पड़ा रहे। लिहाजा, यह जरूरी है कि सरकार और निर्वाचन आयोग मिल कर इस पर अंकुश लगाने की प्रभावी पहल करें।

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